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न्यूक्लियर संधि समाप्त न्यू स्टार्ट खत्म, हथियार नियंत्रण कमजोर, वैश्विक सुरक्षा पर संकट गहराया International / अंतरराष्ट्रीय Zabaykalsky Krai - Aginskoye
अमेरिका-रूस न्यू स्टार्ट संधि समाप्त, परमाणु हथियार नियंत्रण पर दुनिया की चिंता बढ़ी
06 Feb 2026, 06:28 AM
Portal : Jagat Vichar Reporter : Mahesh Sharma
Aginskoye अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली ऐतिहासिक न्यू स्टार्ट (New START) संधि आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई है। यह संधि 5 फरवरी 2026 को अमेरिकी समयानुसार और 6 फरवरी 2026 को भारतीय समयानुसार खत्म हुई। इसके साथ ही दुनिया के दो सबसे बड़े परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच आखिरी प्रभावी हथियार नियंत्रण समझौता भी समाप्त हो गया है, जिससे वैश्विक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।

न्यू स्टार्ट संधि पर वर्ष 2010 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत दोनों देशों को अपने तैनात परमाणु वॉरहेड्स और लॉन्च सिस्टम की संख्या सीमित रखने की बाध्यता थी। साथ ही पारदर्शिता बनाए रखने के लिए निरीक्षण और सत्यापन की व्यवस्था भी शामिल थी, जिससे आपसी भरोसा कायम रहता था।

हालांकि बीते कुछ वर्षों में यह व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। कोविड-19 महामारी के दौरान निरीक्षण प्रक्रियाएं बाधित हुईं और इसके बाद यूक्रेन युद्ध ने अमेरिका-रूस संबंधों में भारी तनाव पैदा कर दिया। वर्ष 2023 में रूस ने इस संधि में अपनी भागीदारी निलंबित कर दी थी, जिससे इसके भविष्य पर पहले ही सवाल खड़े हो चुके थे।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव और कई अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस संधि के खत्म होने से परमाणु हथियारों की नई दौड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। बिना किसी सत्यापन तंत्र के दोनों देशों के पास एक-दूसरे की परमाणु गतिविधियों पर नजर रखने का कोई औपचारिक तरीका नहीं बचेगा, जिससे गलतफहमी और तनाव बढ़ने की आशंका है।

इस बीच चीन की बढ़ती परमाणु क्षमता भी वैश्विक चिंता का विषय बन रही है। विशेषज्ञों के अनुसार चीन वर्ष 2030 तक अपने परमाणु वॉरहेड्स की संख्या लगभग 1000 तक पहुंचा सकता है। इससे अमेरिका, रूस और चीन के बीच त्रिकोणीय प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है, जिसका असर केवल सुरक्षा ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

अमेरिका लंबे समय से चाहता रहा है कि भविष्य की किसी भी नई संधि में चीन को भी शामिल किया जाए, लेकिन चीन का तर्क है कि उसकी परमाणु क्षमता अभी अमेरिका और रूस से काफी कम है। इसी कारण वह ऐसी किसी त्रिपक्षीय संधि में शामिल होने से बचता रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में नई कूटनीतिक वार्ताएं बेहद जरूरी हैं। बाइडेन प्रशासन ने पहले रूस के साथ बातचीत की पेशकश की थी, लेकिन यूक्रेन युद्ध के चलते यह संभव नहीं हो सका। यदि समय रहते कोई नया समझौता नहीं हुआ, तो दुनिया एक बार फिर अस्थिर और खतरनाक परमाणु दौर में प्रवेश कर सकती है।