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दुनिया में बैन, भारत में इस्तेमाल जारी
पैराक्वाट डाइक्लोराइड एक अत्यंत जहरीला रसायन है जिसे दुनिया के कई देशों ने पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है, लेकिन भारत में यह अभी भी कृषि कार्यों में उपयोग किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह केमिकल इतनी खतरनाक क्षमता रखता है कि इसकी थोड़ी मात्रा भी इंसान के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इसके बावजूद खेतों में खरपतवार नियंत्रण के लिए इसका उपयोग जारी है। वैश्विक स्तर पर 70 से अधिक देशों ने इसके उपयोग पर रोक लगाई है, क्योंकि इससे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को गंभीर खतरा होता है। इसके प्रभाव को देखते हुए इसे "सायलेंट किलर केमिकल" भी कहा जाता है। भारत में इसके उपयोग को लेकर लगातार बहस जारी है, लेकिन अब तक इसे पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया गया है।
खतरनाक इतिहास और रासायनिक प्रभाव
पैराक्वाट का विकास 1960 के दशक में खरपतवार नाशक के रूप में किया गया था, और शुरुआती दौर में इसे कृषि क्रांति के लिए उपयोगी माना गया। लेकिन समय के साथ इसके घातक प्रभाव सामने आने लगे। यह रसायन शरीर में प्रवेश करते ही फेफड़ों, किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। इसका कोई प्रभावी एंटीडोट अब तक विकसित नहीं किया जा सका है, जिससे इसके संपर्क में आने वाला व्यक्ति अक्सर बच नहीं पाता। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार यह पानी और मिट्टी को भी प्रदूषित करता है, जिससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान होता है। कई अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों ने इसे अत्यधिक जोखिमपूर्ण श्रेणी में रखा है और इसके पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश की है।
भारत में कृषि उपयोग की वास्तविकता
भारत में हरित क्रांति के बाद कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक खरपतवार नाशकों का उपयोग तेजी से बढ़ा। पैराक्वाट को भी इसी दौर में सीमित नियंत्रणों के साथ अनुमति दी गई थी। इसका मुख्य कारण था कम लागत और तेज प्रभाव, जिससे किसानों को श्रम लागत में राहत मिली। हालांकि, समय के साथ इसके दुष्प्रभावों को लेकर कई रिपोर्ट सामने आईं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग अभी भी जारी है। छोटे और मझोले किसान इसे आसानी से उपलब्ध होने के कारण उपयोग करते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जागरूकता की कमी और सख्त निगरानी व्यवस्था न होने के कारण इसका उपयोग पूरी तरह खत्म नहीं हो सका है।
कई देशों में पूर्ण प्रतिबंध का कारण
यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई विकसित देशों ने पैराक्वाट को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है क्योंकि वहां के शोध में इसके गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव साबित हो चुके हैं। इन देशों में कृषि क्षेत्र को सुरक्षित विकल्पों की ओर स्थानांतरित किया गया है। चीन जैसे देशों ने भी इसके घरेलू उपयोग पर रोक लगाई है, हालांकि उत्पादन और निर्यात पर सीमित नियंत्रण बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों का मानना है कि यह केमिकल मानव जीवन के लिए अत्यंत खतरनाक है और इसके सुरक्षित उपयोग की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। यही कारण है कि इसे वैश्विक स्तर पर सबसे विवादित कृषि रसायनों में गिना जाता है।
भारत में नीति और निगरानी की चुनौती
भारत में इस रसायन को लेकर नीति स्तर पर अभी भी बहस जारी है। कुछ विशेषज्ञ इसे सीमित और नियंत्रित उपयोग के तहत रखने की सलाह देते हैं, जबकि कई स्वास्थ्य संगठन इसके पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं। समस्या यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी तंत्र कमजोर है, जिससे इसका अनियंत्रित उपयोग संभव हो जाता है। कई मामलों में किसानों को इसके खतरों की पूरी जानकारी नहीं होती, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ जाता है। कृषि मंत्रालय और वैज्ञानिक संस्थानों के सामने यह चुनौती है कि वे सुरक्षित विकल्प विकसित करें और किसानों को जागरूक बनाएं ताकि भविष्य में इस तरह के खतरनाक रसायनों पर निर्भरता कम हो सके।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बढ़ता खतरा
पैराक्वाट का उपयोग केवल कृषि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके संपर्क में आने से सांस संबंधी बीमारियां, अंगों की विफलता और गंभीर विषाक्तता जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा यह मिट्टी की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है, जिससे कृषि भूमि की उत्पादकता पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। पर्यावरण वैज्ञानिक इसे "दीर्घकालिक विष" की श्रेणी में रखते हैं। बढ़ती जागरूकता के बावजूद इसके उपयोग को रोकना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जिस पर सरकार और वैज्ञानिक समुदाय को मिलकर काम करने की जरूरत है।
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