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वट सावित्री पर विशेष पूजा
वट सावित्री व्रत पर बरगद पूजा का विशेष महत्व, सुहागिन महिलाओं ने अखंड सौभाग्य के लिए की आराधना
16 May 2026, 11:39 AM Uttar Pradesh - Varanasi
Reporter : Mahesh Sharma
Varanasi

सुबह से मंदिरों और बरगद वृक्षों पर उमड़ी श्रद्धा

देशभर में वट सावित्री व्रत के अवसर पर सुहागिन महिलाओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा-अर्चना की। सुबह से ही मंदिरों और बरगद के पेड़ों के आसपास महिलाओं की भीड़ दिखाई दी। महिलाओं ने पारंपरिक परिधान पहनकर पूजा की थाली सजाई और पति की लंबी उम्र तथा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत वैवाहिक जीवन की खुशहाली और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बरगद वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। महिलाएं बरगद के पेड़ की परिक्रमा करते हुए रक्षा सूत्र बांधती हैं और धार्मिक मंत्रों का जाप करती हैं। कई स्थानों पर सामूहिक पूजा का आयोजन भी किया गया, जहां महिलाओं ने कथा सुनकर धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए। धार्मिक स्थलों पर सुबह से ही भक्ति और आस्था का वातावरण देखने को मिला। पूजा के दौरान महिलाओं ने अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पर्व भारतीय परंपरा और वैवाहिक संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। हर वर्ष बड़ी संख्या में महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा के साथ निभाती हैं।

बरगद वृक्ष को माना जाता है पवित्र प्रतीक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष अत्यंत पवित्र और देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। कहा जाता है कि इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। इसी कारण वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। महिलाएं इस दिन वृक्ष की परिक्रमा कर अखंड सौभाग्य और परिवार की रक्षा की कामना करती हैं। धार्मिक ग्रंथों में बरगद को दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक भी बताया गया है। इस व्रत के दौरान महिलाएं जल, फल, फूल और पूजन सामग्री अर्पित कर विधि-विधान से पूजा करती हैं। कई जगहों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन भी किए। पुरोहितों के अनुसार बरगद वृक्ष की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहती है। इसके अलावा परिवार में सकारात्मक ऊर्जा और शांति का वातावरण बना रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति और धर्म का गहरा संबंध रहा है, जिसका सुंदर उदाहरण वट सावित्री व्रत में देखने को मिलता है।

सावित्री और सत्यवान की कथा का विशेष महत्व

वट सावित्री व्रत की परंपरा सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा के लिए कठोर तप और भक्ति की थी। कहा जाता है कि अपनी अटूट श्रद्धा और संकल्प के बल पर उन्होंने यमराज से अपने पति का जीवन वापस प्राप्त किया था। इसी वजह से यह व्रत वैवाहिक निष्ठा, प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। व्रत के दौरान महिलाएं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती और पढ़ती हैं। कई मंदिरों में कथा वाचन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस कथा से वैवाहिक जीवन में विश्वास और प्रेम मजबूत होता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार यह पर्व महिलाओं की आस्था और परिवार के प्रति समर्पण को दर्शाता है। आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाती हैं। विभिन्न राज्यों में इस पर्व को अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल भाव पति की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली ही माना जाता है।

परिक्रमा और मंत्र जाप का धार्मिक महत्व

वट सावित्री व्रत में बरगद वृक्ष की परिक्रमा और मंत्र जाप को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। महिलाएं पूजा के दौरान वृक्ष के चारों ओर धागा बांधते हुए कई बार परिक्रमा करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं और दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। पूजा के दौरान बोले जाने वाले मंत्रों को आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक प्रभाव का प्रतीक माना जाता है। कई महिलाओं ने पूरे विधि-विधान के साथ पूजा कर परिवार की खुशहाली और समृद्धि की कामना की। धार्मिक स्थलों पर पुरोहितों ने मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न कराई। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय परंपराओं में मंत्र जाप और वृक्ष पूजा का विशेष महत्व रहा है। यह केवल धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान का भी प्रतीक माना जाता है। व्रत और पूजा के दौरान महिलाओं में विशेष उत्साह दिखाई दिया। कई स्थानों पर महिलाओं ने पारंपरिक गीत भी गाए और एक-दूसरे को व्रत की शुभकामनाएं दीं।

घरों और बाजारों में दिखी पर्व की रौनक

वट सावित्री व्रत को लेकर बाजारों और घरों में सुबह से ही उत्साह दिखाई दिया। पूजा सामग्री, फल, मिठाई, साड़ी और श्रृंगार के सामान की दुकानों पर भीड़ देखने को मिली। महिलाएं पूजा के लिए विशेष तैयारी करती नजर आईं। कई घरों में पारंपरिक व्यंजन बनाए गए और परिवार के साथ धार्मिक अनुष्ठान किए गए। बाजारों में फूल, पूजा की थालियां और रक्षा सूत्र की मांग बढ़ गई। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि हर वर्ष इस पर्व के दौरान बाजारों में विशेष रौनक देखने को मिलती है। मंदिरों और धार्मिक स्थलों के आसपास भी सजावट की गई थी। कई महिलाओं ने सुबह से निर्जला व्रत रखकर पूजा पूरी की। धार्मिक आयोजनों के चलते कई जगहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे पर्व भारतीय संस्कृति और सामाजिक परंपराओं को मजबूत बनाने का काम करते हैं। यह पर्व परिवार और समाज को एक साथ जोड़ने का भी माध्यम माना जाता है। लोगों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ इस पर्व को मनाया।

आस्था और परंपरा का सुंदर संगम बना पर्व

वट सावित्री व्रत भारतीय परंपरा, आस्था और पारिवारिक मूल्यों का सुंदर प्रतीक माना जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि वैवाहिक जीवन में विश्वास, प्रेम और समर्पण का संदेश भी देता है। आज के आधुनिक दौर में भी बड़ी संख्या में महिलाएं इस व्रत को पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ निभाती हैं। धार्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे पर्व भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूत बनाए रखते हैं। प्रकृति पूजा, मंत्र जाप और पारिवारिक एकता का संदेश इस पर्व को विशेष बनाता है। विभिन्न राज्यों और शहरों में अलग-अलग परंपराओं के बावजूद वट सावित्री व्रत का मूल उद्देश्य एक ही रहता है—परिवार की खुशहाली और पति की लंबी उम्र की कामना। इस अवसर पर महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा कर अपनी आस्था प्रकट की। मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर पूरे दिन श्रद्धालुओं की भीड़ बनी रही। भक्ति, परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा यह पर्व लोगों के बीच विशेष महत्व रखता है।

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