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पुरी में जगन्नाथ मंदिर की प्राचीन बनकलगी परंपरा आज निभाई जाएगी
ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में आज एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान ‘बनकलगी’ संपन्न किया जाएगा। इस दौरान मंदिर के कपाट कुछ घंटों के लिए श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु बंद रखे जाएंगे। यह परंपरा भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विशेष श्रृंगार से जुड़ी हुई मानी जाती है। सदियों से चली आ रही यह रस्म मंदिर की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में शामिल है और इसे अत्यंत गोपनीय तरीके से संपन्न किया जाता है।
चार घंटे तक बंद रहेंगे मंदिर के कपाट, श्रद्धालुओं को इंतजार
इस विशेष अनुष्ठान के कारण मंदिर के कपाट लगभग चार घंटे तक बंद रहेंगे। इस दौरान केवल चुनिंदा सेवायत और पुजारी ही मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर सकेंगे। मंदिर प्रशासन के अनुसार, यह परंपरा पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई जाती है। कपाट बंद रहने के दौरान भक्तों को बाहर ही प्रतीक्षा करनी पड़ती है, लेकिन जैसे ही अनुष्ठान पूरा होता है, फिर से दर्शन की व्यवस्था शुरू कर दी जाती है।
भगवान के श्रीमुख श्रृंगार से जुड़ी है बनकलगी की परंपरा
बनकलगी अनुष्ठान को भगवान के श्रीमुख श्रृंगार की परंपरा भी कहा जाता है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ और अन्य विग्रहों के चेहरे पर विशेष रंगों से अलंकरण किया जाता है। यह कार्य अत्यंत सावधानी और पारंपरिक विधि से किया जाता है। माना जाता है कि इस प्रक्रिया से भगवान का दिव्य स्वरूप और अधिक आकर्षक हो जाता है। यही कारण है कि यह अनुष्ठान मंदिर की सबसे विशेष धार्मिक रस्मों में गिना जाता है।
जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक रंगों से किया जाता है पवित्र श्रृंगार
बनकलगी के दौरान जिन रंगों का उपयोग किया जाता है, वे पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं। इन रंगों को विशेष जड़ी-बूटियों, कस्तूरी और कपूर जैसे पवित्र तत्वों से तैयार किया जाता है। इनका प्रयोग भगवान के मुखमंडल को सजाने के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह प्रक्रिया केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं बल्कि आध्यात्मिक महत्व भी रखती है। इससे मंदिर की परंपराओं और आस्था की गहराई झलकती है।
गोपनीय तरीके से संपन्न होती है यह प्राचीन धार्मिक रस्म
बनकलगी अनुष्ठान की सबसे खास बात इसकी गोपनीयता है। इस प्रक्रिया के दौरान मंदिर के द्वार पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं और बाहर किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं होती। केवल मंदिर के अधिकृत सेवायत ही इसमें शामिल होते हैं। परंपरा के अनुसार, यह रस्म सदियों से इसी तरह निभाई जा रही है। भक्तों के बीच इस अनुष्ठान को लेकर गहरी श्रद्धा और उत्सुकता देखने को मिलती है।
अनुष्ठान पूरा होने के बाद फिर शुरू होंगे भगवान के दर्शन
जब बनकलगी की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तब मंदिर के कपाट दोबारा खोल दिए जाते हैं और श्रद्धालुओं के लिए दर्शन की व्यवस्था शुरू कर दी जाती है। इस समय बड़ी संख्या में भक्त भगवान के विशेष श्रृंगार के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर प्रशासन ने भी श्रद्धालुओं से धैर्य बनाए रखने की अपील की है। यह अनुष्ठान न केवल धार्मिक परंपरा का प्रतीक है बल्कि पुरी की सांस्कृतिक पहचान भी माना जाता है।
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