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मस्कट में संवेदनशील संवाद
ईरान-अमेरिका अप्रत्यक्ष वार्ता, चेतावनी संग कूटनीति का संदेश
International / अंतरराष्ट्रीय
Muscat -
Muscat
ओमान में ईरान-अमेरिका की अप्रत्यक्ष वार्ता जारी, तेहरान ने उकसावे पर कड़ी प्रतिक्रिया का संकेत दिया
06 Feb 2026, 12:09 PM
Portal : Jagat Vichar
Reporter :
Mahesh Sharma
Muscat अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से चले आ रहे तनाव के बीच एक अहम कूटनीतिक पहल सामने आई है। दोनों देशों के प्रतिनिधि ओमान की राजधानी मस्कट में अप्रत्यक्ष बातचीत के जरिए संवाद की कोशिश कर रहे हैं। यह वार्ता ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम एशिया में राजनीतिक और सुरक्षा हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।
ओमान इस बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। ओमानी विदेश मंत्री बद्र अलबुसैदी ने ईरान के वरिष्ठ प्रतिनिधि अब्बास अरागची के साथ अलग-अलग बैठकों के बाद अमेरिका से जुड़े विशेष दूतों से भी चर्चा की। ओमान सरकार का कहना है कि इस संवाद का उद्देश्य डिप्लोमेसी और तकनीकी स्तर पर बातचीत के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना है।
ईरान की ओर से इस वार्ता को लेकर संयमित लेकिन सख्त रुख देखने को मिला है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के करीबी माने जाने वाले मंत्री अब्बास अरागची ने साफ शब्दों में कहा कि ईरान शांति और बातचीत के पक्ष में है, लेकिन किसी भी तरह के उकसावे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान की संप्रभुता या राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दी गई, तो देश पूरी मजबूती से जवाब देगा।
अरागची ने सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि बीते एक साल की घटनाओं को ईरान भूला नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका के साथ बातचीत आसान नहीं होगी, लेकिन ईरान कूटनीतिक रास्तों को पूरी तरह बंद भी नहीं करना चाहता। उनका कहना था कि बातचीत सम्मान और बराबरी के आधार पर ही आगे बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष ने भी संकेत दिए हैं कि वह तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संवाद को जरूरी मानता है। हालांकि अमेरिका की ओर से कोई औपचारिक बयान बहुत आक्रामक लहजे में नहीं आया, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि यह बातचीत भविष्य की संभावनाओं को टटोलने की एक कोशिश है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता किसी बड़े समझौते की गारंटी नहीं है, लेकिन दोनों देशों के बीच संवाद का खुला रहना अपने आप में एक सकारात्मक संकेत है। ओमान पहले भी ईरान-अमेरिका के बीच बैक-चैनल डिप्लोमेसी का अहम केंद्र रहा है और इस बार भी उसकी भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर मस्कट में चल रही इन बैठकों पर टिकी है। यह देखना अहम होगा कि क्या यह बातचीत सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रहती है या फिर इससे पश्चिम एशिया की राजनीति में कोई ठोस बदलाव देखने को मिलता है।
ओमान इस बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। ओमानी विदेश मंत्री बद्र अलबुसैदी ने ईरान के वरिष्ठ प्रतिनिधि अब्बास अरागची के साथ अलग-अलग बैठकों के बाद अमेरिका से जुड़े विशेष दूतों से भी चर्चा की। ओमान सरकार का कहना है कि इस संवाद का उद्देश्य डिप्लोमेसी और तकनीकी स्तर पर बातचीत के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना है।
ईरान की ओर से इस वार्ता को लेकर संयमित लेकिन सख्त रुख देखने को मिला है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के करीबी माने जाने वाले मंत्री अब्बास अरागची ने साफ शब्दों में कहा कि ईरान शांति और बातचीत के पक्ष में है, लेकिन किसी भी तरह के उकसावे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान की संप्रभुता या राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दी गई, तो देश पूरी मजबूती से जवाब देगा।
अरागची ने सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि बीते एक साल की घटनाओं को ईरान भूला नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका के साथ बातचीत आसान नहीं होगी, लेकिन ईरान कूटनीतिक रास्तों को पूरी तरह बंद भी नहीं करना चाहता। उनका कहना था कि बातचीत सम्मान और बराबरी के आधार पर ही आगे बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष ने भी संकेत दिए हैं कि वह तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संवाद को जरूरी मानता है। हालांकि अमेरिका की ओर से कोई औपचारिक बयान बहुत आक्रामक लहजे में नहीं आया, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि यह बातचीत भविष्य की संभावनाओं को टटोलने की एक कोशिश है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता किसी बड़े समझौते की गारंटी नहीं है, लेकिन दोनों देशों के बीच संवाद का खुला रहना अपने आप में एक सकारात्मक संकेत है। ओमान पहले भी ईरान-अमेरिका के बीच बैक-चैनल डिप्लोमेसी का अहम केंद्र रहा है और इस बार भी उसकी भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर मस्कट में चल रही इन बैठकों पर टिकी है। यह देखना अहम होगा कि क्या यह बातचीत सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रहती है या फिर इससे पश्चिम एशिया की राजनीति में कोई ठोस बदलाव देखने को मिलता है।