Search News
Tip: Search by heading, content, category, city, state, highlights.
- Select Location
- ताज़ा खबर
- राष्ट्रीय (भारत)
- अंतरराष्ट्रीय
- राज्य व क्षेत्रीय
- राजनीति
- सरकार व प्रशासन
- अपराध
- साइबर अपराध व डिजिटल सुरक्षा
- सुरक्षा व आतंकवाद
- व्यापार व कॉरपोरेट
- मार्केट व निवेश
- स्टार्टअप व उद्यमिता
- स्वास्थ्य
- शिक्षा
- खेल
- मनोरंजन
- धर्म व अध्यात्म
- समाज व सामाजिक मुद्दे
- यात्रा व पर्यटन
Choose Location
Current:
India
Country: India
Selected State: None
कांग्रेस-टीएमसी टकराव तय
बंगाल में कांग्रेस ने ममता के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया
State & Regional / राज्य व क्षेत्रीय
West Bengal -
Kolkata
बंगाल चुनाव में कांग्रेस अकेले मैदान में, ममता सरकार को घेरने की नई रणनीति
06 Feb 2026, 09:14 AM
Portal : Jagat Vichar
Reporter :
Mahesh Sharma
Kolkata पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजरती नजर आ रही है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह राज्य की सभी सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ेगी। इस फैसले के साथ ही बंगाल की चुनावी लड़ाई अब त्रिकोणीय नहीं बल्कि बहुकोणीय होती दिखाई दे रही है, जहां कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी अपने-अपने दावों के साथ मैदान में होंगी।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही यह ऐलान कर चुकी हैं कि तृणमूल कांग्रेस किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। अब कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय ने विपक्षी राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि पार्टी को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए स्वतंत्र रूप से जनता के बीच जाना जरूरी है।
कांग्रेस का फोकस इस बार सीधे ममता सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का है। पार्टी राज्य में बेरोजगारी, उद्योगों की कमी, कानून-व्यवस्था की स्थिति, पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव जैसे मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाने की तैयारी में है। साथ ही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों पर भी कांग्रेस सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि तृणमूल और भाजपा के बीच की लड़ाई में कांग्रेस को जानबूझकर हाशिए पर रखा गया, लेकिन अब पार्टी जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत कर सीधे मुकाबले में उतरना चाहती है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की भूमिका इस चुनाव में अहम मानी जा रही है, क्योंकि पार्टी नेतृत्व राज्य इकाई को खुली छूट देने के संकेत दे चुका है।
वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी बता रही है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस बंगाल में अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को विपक्षी एकता की विफलता के रूप में पेश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला वोटों के बंटवारे को और गहरा कर सकता है। इससे सीधा फायदा किसे होगा, यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि बंगाल का चुनाव अब सिर्फ ममता बनर्जी बनाम भाजपा नहीं रहेगा।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस किस ठोस एजेंडे और संगठनात्मक ताकत के साथ मैदान में उतरती है और क्या वह बंगाल की राजनीति में खुद को फिर से प्रासंगिक बना पाती है या नहीं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही यह ऐलान कर चुकी हैं कि तृणमूल कांग्रेस किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। अब कांग्रेस के अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय ने विपक्षी राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि पार्टी को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए स्वतंत्र रूप से जनता के बीच जाना जरूरी है।
कांग्रेस का फोकस इस बार सीधे ममता सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का है। पार्टी राज्य में बेरोजगारी, उद्योगों की कमी, कानून-व्यवस्था की स्थिति, पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव जैसे मुद्दों को चुनावी एजेंडा बनाने की तैयारी में है। साथ ही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों पर भी कांग्रेस सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि तृणमूल और भाजपा के बीच की लड़ाई में कांग्रेस को जानबूझकर हाशिए पर रखा गया, लेकिन अब पार्टी जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत कर सीधे मुकाबले में उतरना चाहती है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की भूमिका इस चुनाव में अहम मानी जा रही है, क्योंकि पार्टी नेतृत्व राज्य इकाई को खुली छूट देने के संकेत दे चुका है।
वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी बता रही है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस बंगाल में अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को विपक्षी एकता की विफलता के रूप में पेश कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला वोटों के बंटवारे को और गहरा कर सकता है। इससे सीधा फायदा किसे होगा, यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि बंगाल का चुनाव अब सिर्फ ममता बनर्जी बनाम भाजपा नहीं रहेगा।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस किस ठोस एजेंडे और संगठनात्मक ताकत के साथ मैदान में उतरती है और क्या वह बंगाल की राजनीति में खुद को फिर से प्रासंगिक बना पाती है या नहीं।